श्रीकृष्ण पाथेय श्रीकृष्ण के जीवन, लीलाओं और दर्शन को आज के मनुष्य की दृष्टि से समझने वाली एक विचारोत्तेजक कृति है। मथुरा के कारागार में जन्मी आशा से लेकर गोकुल के सहज प्रेम, वृन्दावन की लीलाओं, कंस के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष, द्वारका के निर्माण, कूटनीति और कुरुक्षेत्र में दिए गए भगवद्गीता के अमर संदेश तक—यह पुस्तक श्रीकृष्ण की जीवन-यात्रा को एक नए अर्थ में प्रस्तुत करती है।
यहाँ माखन चोरी बाल हठ से आगे बढ़कर अन्याय के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध बनती है, कालिया दमन प्रकृति को विषमुक्त करने का संदेश देता है, गोवर्धन पूजा मनुष्य और पर्यावरण के संबंध को सामने लाती है, रासलीला प्रेम और अहंकार-विसर्जन का अर्थ खोलती है, और महाभारत हमें कर्तव्य, करुणा तथा विवेक के बीच संतुलन साधना सिखाता है।
देवऋषि ने श्रीकृष्ण को एक दिव्य अवतार के साथ-साथ मित्र, शिक्षक, प्रेमी, रणनीतिकार, समाज-सुधारक और जीवन के सारथी के रूप में देखा है। कथा, दर्शन, मनोविज्ञान और समकालीन जीवन के प्रश्नों को जोड़ती यह पुस्तक पाठक को अपने निर्णयों, संबंधों, भय, संघर्ष और उद्देश्य पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
यह श्रीकृष्ण की कथा पढ़ने की पुस्तक नहीं, उनके पथ को समझने और अपने भीतर की चेतना को पहचानने की यात्रा है।